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Agromet Advisory (Hindi)

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मौसम आधारित कृषि परामर्श सेवाएं
ग्रामीण कृषि मौसम सेवा
कृषि भौतिकी संभाग
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली – 110012       
(दिल्ली और इसके आस-पास के गाँवों के लिए) Website:
www.iari.res.in

साल-21, क्रमांक :- 34/2014-15/शुक्र.     समयअपराह्न  2.30 बजे              दिनांक: 25-07-2014

बीते सप्ताह का मौसम (19 जुलाई से 25 जुलाई,  2014)

                          सप्ताह के दौरान आसमान में बादल छाये रहें। 23 जुलाई को 12.4 मि.मी वर्षा संस्थान की वैधशाला मे दर्ज की गई। दिन का अधिकतम तापमान 29.0 से 35.0 डिग्री सेल्सियस (साप्ताहिक सामान्य 34.1 डिग्री सेल्सियस) तथा न्यूनतम तापमान 23.8 से 28.0 डिग्री सेल्सियस (साप्ताहिक सामान्य 26.8 डिग्री सेल्सियस) रहा। इस दौरान पूर्वाह्न 7.21 को सापेक्षिक आर्द्रता 88 से 95 तथा दोपहर बाद अपराह्न 2.21 को 66 से 94 प्रतिशत दर्ज की गई। सप्ताह के दौरान दिन में औसत 3.4 घंटे  प्रति दिन (साप्ताहिक सामान्य 6.9 घंटे) धूप खिली रही। हवा की औसत गति 5.6 कि.मी. प्रति घंटा (साप्ताहिक  सामान्य  6.2 कि. मी. प्रति घंटा) तथा वाष्पीकरण की औसत दर 6.2 मि.मी. (साप्ताहिक सामान्य 6.7 मि.मी.)  प्रति दिन रही। सप्ताह के दौरान पूर्वाह्न तथा अपराह्न को हवा भिन्न-भिन्न दिशाओं से रही। 

भारत मौसम विज्ञान विभाग, क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केन्द्र, सफदरजंग विमानपत्तन, नई दिल्ली  से प्राप्त मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान

मौसमी तत्व/दिनांक

26-07-14

27-07-14

28-07-14

29-07-14

30-07-14

वर्षा (मि.मी.)

1

11

13

7

0

अधिकतम तापमान {°सेल्सियस}

35

32

30

29

32

न्यूनतम तापमान {° सेल्सियस}

27

27

26

26

25

बादलों की स्थिति (ओक्टा)

3

8

8

8

7

सापेक्षिक आर्द्रता(प्रतिशत) सुबह

80

85

90

95

90

सापेक्षिक आर्द्रता(प्रतिशत) शाम

55

50

70

80

65

हवा की गति (कि.मी/घंटा)

007

006

013

009

006

हवा की दिशा

दक्षिण -दक्षिण-

पूर्व

दक्षिण-दक्षिण-

पश्चिम

पश्चिम -दक्षिण-

पश्चिम

पूर्व -उत्तर- पूर्व

 

पूर्व -उत्तर- पूर्व

 

साप्ताहिक मौसम पर आधारित कृषि सम्बंधी सलाह 30 जुलाई , 2014 तक के लिए

कृषि परामर्श सेवाओं, कृषि भौतिकी संभाग के कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार किसानों को निम्न कृषि कार्य करने की सलाह दी जाती है।

1.      मौसम को ध्यान मे रखते हुए सभी खडी फसलों तथा वर्षाकालीन सब्जियों में खरपतवार नियंत्रण का ध्यान रखें।

2.      किसान भाई इस सप्ताह मक्का की बुवाई मेड़ों (उथली क्यारियों) में कर सकते हैं । संकर किस्में  ए एच-421 व ए एच-58 तथा उन्नत किस्में पूसा कम्पोजिट-3, पूसा कम्पोजिट-4 । बीज की मात्रा 20 किलोग्राम/हैक्टर रखें। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60-75 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 18-25 से.मी. रखें। मक्का में खरपतवार नियंत्रण के लिए एट्राजिन 1 से 1.5 किलोग्राम/हैक्टर 800 लीटर पानी में घोल कर छिडकाव आसमान साफ होने पर करें।

3.      किसान भाईयों को सलाह है कि बाजरे (किस्में-संकर बाजरा पूसा-605, संकर बाजरा पूसा-415, संकुल बाजरा पूसा-383, एच.एस.वी-67) की बुवाई शीघ्र करें। बीज को उपचारित करना आवश्यक है विशेष रूप से अरगट रोग के रोकथाम के लिए 10 % नमक के घोल में बीजों को भिगो दें तथा ऊपर आये हुए खराब व हल्के बीजों को निकालकर फेंक दें इसके उपरांत बीजों को थीरम या बावस्टिन दवाई 2.0 ग्राम/किलोग्राम की दर से उपचारित करे ताकि बीज जनित रोग खत्म हो जाय।

4.      सोयाबीन की फसल की बुवाई इस सप्ताह कर सकतें है। उन्नत किस्में: पूसा-9712, पूसा-9814 तथा पूसा-16 । बीज दर 80 किलोग्राम / हैक्टर रखें।

5.      इस मौसम में किसान भाई कपास में रस चूसने वाले कीटों से बचाव के लिए इमिडाक्लोप्रिड कीटनाशक 0.5 मि.ली./ली. पानी में मिलाकर छिड़काव मौसम साफ होने पर करें। अन्य कीटों से बचाव के लिए फेरोमोन ट्रेप एवं प्रकाश प्रपंच का उपयोग कर सकते है। जिन खेतों में मिली बग का प्रकोप दिखाई दे तो किसान भाई प्रभावित पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें। यदि कीटों की संख्या अधिक हो तो 2% साबुन का घोल बनाकर छिड़काव करें। उसके बाद क्यूनालफाँस (Quinalphos) @ 2 मि.ली./ली. पानी में मिलाकर छिड़काव मौसम साफ होने पर करें।

6.    मौसम को ध्यान में रखते हुए किसान भाई स्वीट कोर्न, बेबी कोर्न की बुवाई कर सकते हैं।

7.      जो किसान भाई सिमित सिंचाई जल के कारण धान की रोपाई नही कर पाये हैं, वे कम अवधि वाली मक्का, उड़द, मूंग व लोबिया की बुवाई कर सकते हैं इससे कम पानी में अच्छी पैदावार ले सकते हैं। बुवाई के समय संतुलित मात्रा में गोबर की सड़ी गली खाद का प्रयोग करें क्योंकि यह भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ाता है।

8.      देर से बोये गन्ने में निराई-गुड़ाई एंव मिट्टी चढ़ाने का कार्य करें व फसल की लगातार निगरानी करते रहें यदि पत्तियों के ऊपरी हिस्से पीले होने लगे तो रोकथाम के लिए करटाप 4 % दानें 10.0 किलोग्राम/ एकड़ की दर से बुरकाव करें ताकि कीटों से समय पर बचाव हो सकें एंव गन्ने की फसल मे बेधक कीटों के प्रबन्धन के लिए ट्राइको कार्ड का प्रयोग अवश्य करें।

9.      खरीफ की सभी फसलों में आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई करके खरपतवारों का नियंत्रण करें। इससे खरपतवारों द्वारा फसलों को कम हानि होती है तथा जल की बचत होती है और जड़ों का विकास अच्छा होता है।

10.  किसान भाई अपने खेतों में मेड़ों को बनाने का कार्य शीघ्र करें। मेडें चोडी तथा ऊँची होनी चाहिए ताकि वर्षा पानी का ज्यादा से ज्यादा काम उपयोग हो सके। वर्षा होने पर अपवाहित जल का तालाबों और अन्य संरचनाओं में संचय किया जाए ताकि आवश्यकता पड़ने पर जीवनदायी सिंचाई की जा सकें।

11.  वर्षाकालीन सब्जियों में विषाणु रोग से ग्रसित पौधों को उखाड़कर जमीन में गाड़ दें। उसके उपरांत इमिडाक्लोप्रिड @ 0.3 मि.ली./लीटर की दर से छिड़काव आसमान साफ होने पर करें।

12.  यह समय चारे के लिए ज्वार की बुवाई के लिए उप्युक्त हैं अतः किसान भाई पूसा चरी-9, पूसा चरी-6 या सकंर किस्मों की बुवाई करें । बीज की मात्रा 40 किलोग्राम/हैक्टर रखें। किसान भाई चारे के लिए लोबिया की बुवाई भी कर सकते हैं।

13.  जिन किसान भाईयों की टमाटर, हरी मिर्च, बैंगन व फूलगोभी की पौध तैयार है, वे मौसम को मध्यनजर रखते हुए रोपाई मेड़ों (उथली क्यारियों) पर करें।

14.  किसान भाई इस समय मूली- वर्षा की रानी, समर लोंग, लोंग चेतकी; पालक- आल ग्रीन तथा धनिया- पंत हरितमा या संकर किस्मों की बुवाई करें।

15.  इस मौसम में किसान ग्वार, लोबिया, भिंडी, सेम, पालक, चोलाई आदि फसलों की बुवाई कर सकते हैं। बीज किसी प्रमाणित स्रोत से ही खरीदें।

16.  कद्दूवर्गीय सब्जियों की वर्षाकालीन फसल की बुवाई करें। लौकी की उन्नत किस्में पूसा नवीन, पूसा समृद्वि, पूसा संतुष्टि; करेला की पूसा विशेष, पूसा दो मौसमी; सीताफल की पूसा विश्वास, पूसा विकास; तुरई की पूसा चिकनी, पूसा स्नेह; धारीदार तुरई की पूसा नसदार किस्मों की बुवाई कर सकते हैं।

17.   कद्दूवर्गीय सब्जियों की वर्षाकालीन फसलों में हानिकारक कीटों-बीमारियों की निगरानी करें व बेलों को ऊपर चढ़ाने की व्यवस्था करें।

18.   कद्दूवर्गीय एवं अन्य सब्जियों में मघुमक्खियों का बडा योगदान है क्योंकि, वे परांगण में सहायता करती है इसलिए जितना संभव हो मघुमक्खियों के पालन को बढ़ावा दें। कीड़ों एवं बीमारियों की निरंतर निगरानी करते रहे, कृषि विज्ञान केन्द्र से सम्पर्क रखें व सही जानकारी लेने के बाद ही दवाईयों का प्रयोग करें। फल मक्खी से प्रभावित फलों को तोडकर गहरे गड्डे में दबा दें, फल मक्खी के बचाव हेतू खेत में विभिन्न जगहो पर गुड़ या चीनी के साथ मैलाथियान (Malathion 0.1 %) का घोल बनाकर छोटे कप या किसी और बरतन में रख दें  ताकि फल मक्खी का नियंत्रण हो सके।

19.  वर्षा आधारित एवं बारानी क्षेत्रों में भूमि मे  नमी संचयन के लिए पलवार(मलचिंग) का प्रयोग करना लाभदायक होगा तथा गोबर की सड़ी गली खाद का अधिक से अधिक प्रयोग करें क्योंकि यह भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ाता है, फसलों में पोटाश उर्वरक का प्रयोग करें इससे फसलों में सुखा सहन करने की शक्ति ज्यादा होती है एवं कीटों व बीमारियों का प्रकोप भी कम होता है। 

सलाहकार समिति के वैज्ञानिक   
डा. अनन्ता वशिष्ठ (नोड़ल अधिकारी, कृषि भौतिकी संभाग) 
डा.रवीन्द्र सिंह (अध्यक्ष, कृषि भौतिकी संभाग)
डा.सुभाष चन्द्र (प्रधान वैज्ञानिक, कीट विज्ञान संभाग)
डा.जे.पी.एस. ड़बास (प्रधान वैज्ञानिक ,केटेट)
डा.बी.एस.तोमर (प्रधान वैज्ञानिक, बीज उत्पादन इकाई)
डा.दिनेश कुमार (प्रधान वैज्ञानिक, सस्य विज्ञान संभाग)
डा.देब कुमार दास (वरिष्ठ वैज्ञानिक, कृषि भौतिकी संभाग)
डा.पी.सिन्हा (प्रधान वैज्ञानिक, पादप रोग संभाग)