स्टार्च (एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला पॉलीसैकराइड पॉलिमर) पर कृत्रिम मोनोमर ग्राफ्ट करके हाइड्रोफिलिक पॉलिमर तैयार किए गए हैं, जिनका उद्देश्य जल अवशोषण बढ़ाना और जल हानि को विलंबित करना है। हाल ही में विकसित कार्बोक्सीमेथाइल सेल्यूलोज आधारित कुछ पॉलिमरों ने लगभग 33,000% (m/m) जल अवशोषण दिखाया है। ये हाइड्रोजेल शुष्क/वर्षा-आश्रित कृषि, हाई-टेक उद्यानिकी एवं पुष्पोत्पादन, मृदा-रहित माध्यम में नर्सरी उत्पादन, मृदा सुधार, कृषि वानिकी, कृत्रिम लॉन एवं लैंडस्केप, छत की बागवानी आदि में उपयोगी हैं।
कृत्रिम कीटनाशी, नीम इमल्सीफाएबल कंसंट्रेट (EW), अजादिरैक्टिन-A कंसंट्रेट, नीम तेल माइक्रोइमल्शन/माइक्रोइमल्शन-फॉर्मिंग कंसंट्रेट तथा सामान्य परिस्थितियों में डाइहाइड्रोअजादिरैक्टिन-A कंसंट्रेट बनाने की प्रक्रियाएँ विकसित की गई हैं।
नीम पत्तियों के अर्क पर आधारित एक शाकनाशी संरचना विकसित की गई है, जो फालेरिस माइनर खरपतवार को नियंत्रित करती है और गेहूँ की वृद्धि को प्रभावित नहीं करती।
प्राकृतिक एवं कृत्रिम पॉलिमर, अकेले या अकार्बनिक निष्क्रिय पदार्थों के साथ मिलाकर, बीज आवरण (सीड कोट) के रूप में सफलतापूर्वक विकसित किए गए हैं। इनमें नीम मेलियासिन्स जैसे वनस्पति सक्रिय घटकों का उपयोग किया गया है। ऐसे बीज आवरण अंकुरण, जीवनीयता, रोपण क्षमता एवं स्फूर्ति में सुधार करते हैं तथा कवक/सूत्रकृमि/कीट संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
नीम तेल लेपित यूरिया (NOCU), पूसानीम गोल्डन यूरिया तथा नीम कड़वा लेपित यूरिया विकसित किए गए हैं। धान पर क्षेत्रीय परीक्षणों में 7–17% तक उपज वृद्धि दर्ज की गई।
डिलापिओल, जो Anethum sowa Roxb. के आवश्यक तेल में 20–40% तक पाया जाने वाला अवांछनीय घटक है, तथा उसका डाइहाइड्रो व्युत्पन्न, आयातित एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य सहक्रियक पाइपरोनिल ब्यूटॉक्साइड (PBO) के स्वदेशी विकल्प के रूप में विकसित किए गए हैं।
फोरेट के नियंत्रित विमोचन (Controlled release) फॉर्मुलेशन पॉलिस्टाइरीन, पॉलीविनाइल क्लोराइड, पॉलीमेथाइल मेथाक्रिलेट, पॉलीएथिलीन ग्लाइकोल, सेल्यूलोज एसीटेट, एथिल सेल्यूलोज एवं स्टार्च ज़ैंथेट में मोनोलिथिक डिस्पर्शन द्वारा विकसित किए गए हैं। ये फॉर्मुलेशन थाइमेट 10G की तुलना में आधी से एक-चौथाई मात्रा में समान कीट नियंत्रण प्रदान करते हैं।
Rabdosea melissoides पर आधारित मच्छर लार्वीसाइडल तैयारियों की तकनीक विकसित की गई है। इसके आवश्यक तेल तथा फिनोलिक/गैर-फिनोलिक घटक प्रभावी मच्छरनाशी उत्पाद के रूप में विकसित किए गए हैं।
नवीन कीटनाशी यौगिक—ऑक्साइम एस्टर, अल्केन डाइऑल/पॉलीऑल मोनो/डाइ/पॉली अल्कानोएट्स, 4-मेथाइल-6-पेंटाइल-α-पाइरोन्स—विकसित किए गए हैं। ये विशेष रूप से नेमाटिसाइड ( Meloidogyne incognita, Rotylenchulus reniformis ) तथा फंगीसाइड ( Rhizoctonia solani, Sclerotium rolfsii ) के रूप में प्रभावी हैं।
थायोफेनेट-मेथाइल एवं मैनकोज़ेब जैसे पारंपरिक कीटनाशियों के लिए लागत-प्रभावी स्वदेशी तकनीक विकसित कर एनआरडीसी को व्यावसायीकरण हेतु हस्तांतरित की गई है।